सोनहत / कोरिया। भ्रष्टाचार जब बेशर्मी का चोला ओढ़कर जंगलों के सन्नाटे में नाचने लगे, तो नियम-कानून सिर्फ कागजी खिलौने बनकर रह जाते हैं। सोनहत विकासखंड मुख्यालय से लगे घने जंगलों में इन दिनों वन विभाग ने ‘विकास’ के नाम पर महालूट की ऐसी खौफनाक पटकथा लिखी है, जिसने व्यवस्था की नीयत को पूरी तरह नंगा कर दिया है।
गरीब आदिवासियों और मजदूरों के हाथों से निवाला छीनकर, रात के स्याह अंधेरे में जेसीबी और ट्रैक्टरों की जो दहाड़ गूंजी है, उसने यह साफ कर दिया है कि यहाँ ‘जल संरक्षण’ नहीं, बल्कि ‘जेब संरक्षण’ का महाअभियान चल रहा था!
खेल निराला: ‘साहब’ का गणित सीधा—बरसात आएगी, पाप धो जाएगी!
विभागीय कारिंदों का गणित बेहद शातिर था। आनन-फानन में बिना किसी नाप-जोख के, नियम-कायदों को सूली पर चढ़ाकर करीब आठ से दस ‘कागजी तालाबों’ का निर्माण कार्य पूरा दिखा दिया गया। सोच यह थी कि मानसून की पहली बौछार गिरते ही गड्ढों में पानी भर जाएगा और गहराई से लेकर गुणवत्ता तक के सारे पाप हमेशा के लिए जल समाधि ले लेंगे।
लेकिन कुदरत को इस महालूट को बेनकाब करना था! इस साल मानसून ने दगा दे दिया, आसमान साफ रहा और जैसे ही धूप खिली, वन विभाग के इस खोखले ‘जल संरक्षण’ के ढोंग की पूरी कलई उतरकर सामने आ गई।
जनाब! ये तालाब हैं या रेंजर साहब की ‘फोटो गैलरी’?
धरातल पर जाकर देखें तो सच जानकर माथा ठनक जाएगा। सरकारी मापदंडों के अनुसार तालाबों का जो पैमाना होना चाहिए, उसकी धज्जियां उड़ा दी गई हैं:
न मेड़ का ठिकाना, न गहराई का पता: जमीन को सिर्फ ऊपर-ऊपर से कुतरकर खानापूर्ति कर दी गई।
फाइलों में ‘सुपरहिट’ तस्वीरें: रेंजर साहब ने ऊपर के अधिकारियों से कथित ‘सांठगांठ’ की ऐसी जुगलबंदी बैठाई कि बिना काम के ही पैसों के आहरण (पेमेंट) की फाइलें बिजली की रफ्तार से तैयार हो गईं।बेशर्मी का राग: जब ग्रामीण सवाल पूछते हैं, तो रेंजर साहब बड़े टशन में कहते हैं—”यह विभागीय काम है!” सवाल यह है कि क्या “विभागीय काम” का मतलब शासकीय डकैती का लाइसेंस मिल जाना होता है?
मजदूरों का हक डकारने के पीछे आखिर इतनी छटपटाहट क्यों?
इस भीषण मंदी और बेरोजगारी के दौर में, जहाँ गरीब आदिवासियों को मनरेगा के जरिए रोजगार की सबसे ज्यादा जरूरत थी, वहाँ इंसानों को खदेड़कर मशीनों का साम्राज्य क्यों स्थापित किया गया?
क्या इसलिए कि मजदूरों से काम कराने पर पोल खुलने का डर था?
या फिर मशीनों के जरिए ‘मलाई (कमीशन)’ का लेन-देन ज्यादा आसान, तेज और चुपचाप हो जाता है?
तालाब हैं या किसानों के समतल बहरा खेत? मौके पर जो ढाँचे बने हैं, वे वन्यजीवों की प्यास क्या बुझाएंगे, वे तो पहली तेज बारिश में ही ताश के पत्तों की तरह ढह जाएंगे। जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों रुपये इस अनुपयोगी तमाशे पर पानी की तरह बहा दिए गए।
15 जून की लक्ष्मण रेखा पार: क्या वन विभाग कानून से ऊपर है?
शासन का कड़ा और स्पष्ट आदेश है कि 15 जून के बाद किसी भी तरह का मिट्टी संबंधी कार्य नहीं होगा। लेकिन सोनहत वन विभाग के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्होंने इस सरकारी आदेश को ठेंगा दिखा दिया। मानसून की दस्तक के बाद भी धड़ल्ले से जेसीबी चलती रहीं। आखिर रेंजर और उनके चहेते कर्मचारियों को कानून की धज्जियां उड़ाने की यह खुली छूट किसने दी?
‘नए साहब’ से उम्मीदें थीं, पर आते ही शुरू हुआ ‘बेलगाम मलाई मारो’ दौर!
सोनहत की भोली-भाली जनता को उम्मीद थी कि नए रेंजर साहब के आने से जंगलों और आदिवासियों का भला होगा। लेकिन साहब के आते ही भ्रष्टाचार ने वो ‘सुपरसोनिक रफ्तार’ पकड़ी है कि लोग दातों तले उंगली दबा रहे हैं। रेंजर साहब के नीचे काम करने वाले कुछ चुनिंदा छोटे कर्मचारी इस समय मलाई काटने में इतने मस्त हैं कि वे स्थानीय ग्रामीणों को इंसान तक नहीं समझते।
हद की भी सीमा लांघ दी गई:
मौके पर कोई सूचना पटल (बोर्ड) नहीं लगाया गया ताकि किसी को मद और बजट का पता न चले।
स्थानीय वन समिति के अध्यक्ष निरंजन को पूरी तरह अंधेरे में रखा गया।
जिला पंचायत कोरिया जन सहयोग समिति के उपाध्यक्ष राजू साहू ने भी इस तानाशाही पर गहरा आक्रोश जताते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
“दाल में कुछ काला नहीं, पूरी दाल ही काली है!” — पुष्पेंद्र
कोरिया जन सहयोग समिति के पुष्पेंद्र राजवाड़े ने इस घोटाले पर गरजते हुए वन विभाग को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा:
“यह कोई जल संरक्षण अभियान नहीं, बल्कि अधिकारियों और बिचौलियों का ‘जेसीबी और कमीशन राज’ है। जब गरीब आदिवासी दो वक्त की रोटी को तरस रहा है, तब रेंजर साहब रात के अंधेरे में मशीनों से मजदूरों का हक डकार रहे थे। हम इस शासकीय राशि की डकैती पर खामोश नहीं बैठेंगे। समिति इस पूरे घोटाले के भौतिक सत्यापन और उच्च स्तरीय जांच की मांग करती है। अगर दोषियों पर जल्द कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो ग्रामीणों और मजदूरों को साथ लेकर सड़क से लेकर उग्र आंदोलन तक का शंखनाद किया जाएगा।”
बड़ा सवाल:
क्या कुंभकर्णी नींद में सोया वन विभाग का उच्च प्रबंधन इस “कागजी तालाब कांड” के दोषियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजेगा? या फिर हमेशा की तरह लीपापोती करके इस महाघोटाले की फाइल को भी रद्दी की टोकरी में दफन कर दिया जाएगा? जनता की नजरें टिकी हैं!




