मनेन्द्रगढ़। मनेन्द्रगढ़ वन मंडल के विभिन्न वन परिक्षेत्रों (रेंजों) से आ रही खबरें वन विभाग के दावों की पोल खोल रही हैं। सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, वन मंडल के अंतर्गत आने वाली कई संवेदनशील बीटों में बड़े पैमाने पर कीमती लकड़ियों की अवैध कटाई और तस्करी का खेल बदस्तूर जारी है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल में कथित तौर पर विभाग के ही कुछ पुराने जमे कर्मचारियों का हाथ होने का आरोप लग रहा है।
सालों से एक ही बीट पर जमे हैं वनकर्मी
विभागीय सूत्रों का कहना है कि मनेन्द्रगढ़ वन मंडल के कई ऐसे बीट रक्षक (फॉरेस्ट गार्ड) और वनपाल (डिप्टी रेंजर) हैं, जो पिछले कई वर्षों से एक ही बीट या क्षेत्र में कुंडली मारकर बैठे हुए हैं। नियमतः समय-समय पर होने वाले तबादलों के बावजूद, ये कर्मचारी अपनी रसूख और सांठगांठ के दम पर एक ही जगह टिके हुए हैं। लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में पदस्थ रहने के कारण इन वनकर्मियों का स्थानीय लकड़ी तस्करों और माफियाओं के साथ गहरा नेक्सस (गठजोड़) बन चुका है।
अवैध कटाई को ‘संरक्षण’ देने का आरोप
सूत्रों के मुताबिक, इस साठगांठ का नतीजा यह है कि जंगलों से कीमती दरख्तों को धड़ल्ले से काटा जा रहा है और मैदानी अमला मूकदर्शक बना हुआ है। आरोप है कि ये कर्मचारी मोटी रकम के एवज में तस्करों को न सिर्फ “ग्रीन सिग्नल” देते हैं, बल्कि वन विभाग की गश्त (पेट्रोलिंग) की लाइव लोकेशन भी तस्करों तक पहुंचाते हैं ताकि वे आसानी से बच निकलें। जब कभी उच्च अधिकारियों का दबाव बनता है, तो कोरम पूरा करने के लिए लावारिस हालत में कुछ सूखी लकड़ियां या छोटी-मोटी जब्ती दिखाकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है, जबकि मुख्य सरगना हमेशा रडार से बाहर रहते हैं।
उच्च अधिकारियों की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है। चर्चा है कि स्थानीय ग्रामीणों द्वारा कई बार मौखिक और लिखित शिकायतें दिए जाने के बावजूद, जिम्मेदार उच्च अधिकारी इस पर कोई सख्त कदम नहीं उठा रहे हैं। सालों से एक ही जगह पर जमे इन कर्मचारियों का ट्रांसफर न होना भी उच्च प्रबंधन की भूमिका को संदेहास्पद बनाता है।
सूत्रों का कहना है: “अगर मनेन्द्रगढ़ वन मंडल के पिछले 5-6 सालों के रिकॉर्ड खंगाले जाएं और कर्मचारियों के कार्यक्षेत्र की जांच की जाए, तो एक बहुत बड़ा सिंडिकेट सामने आ सकता है। कई बीट तो ऐसी हैं जहां कागजों पर पेड़ सुरक्षित हैं, लेकिन जमीन पर सिर्फ ठूंठ बचे हैं।”
अब देखना यह होगा कि मनेन्द्रगढ़ वन मंडल के आला अधिकारी इस गंभीर मामले का संज्ञान लेकर सालों से जमे इन कर्मचारियों पर कब तक तबादले और निलंबन की गाज गिराते हैं, या फिर “हरे-भरे जंगलों को खाक करने” का यह खेल यूं ही परदे के पीछे चलता रहेगा।




