MCB-छत्तीसगढ़ के नवगठित मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (MCB) जिले का झगराखांड थाना और मनेन्द्रगढ़ सिटी कोतवाली के मौहरपारा क्षेत्र इन दिनों एक बेहद गंभीर और सामाजिक रूप से विनाशकारी समस्या की गिरफ्त में है। क्षेत्र में अवैध सट्टा कारोबार जिस रफ़्तार और बेखौफ अंदाज में अपने पैर पसार रहा है, वह न केवल कानून-व्यवस्था को खुली चुनौती है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य पर भी एक गहरा आघात है। स्थानीय स्तर पर पंकज और दिवाकर जैसे तथाकथित ‘सेठों के सेठ’ और उनके सिपहसालार जमालू व डीके जैसे ‘चिल्लर पार्टी’ के गुर्गे जिस तरह से इस सिंडिकेट को चला रहे हैं, उसने पूरे इलाके की सामाजिक शांति को दांव पर लगा दिया है।
इस अवैध धंधे का सबसे भयावह पहलू इसका ‘डिजिटलाइजेशन’ है। कभी छिपकर पर्चियों (सट्टा पट्टी) के जरिए चलने वाला यह काला कारोबार अब व्हाट्सएप (WhatsApp) और फोन कॉल्स के जरिए हाईटेक हो चुका है। अब न किसी ठिकाने की जरूरत है, न रंगे हाथों पकड़े जाने का डर। महज एक क्लिक और एक फोन कॉल पर दांव लग रहे हैं। इस आधुनिक तकनीकी जाल ने पुलिस की पारंपरिक कार्यप्रणाली को तो ठेंगा दिखाया ही है, साथ ही सट्टेबाजों के हौसलों को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है।
युवाओं का भविष्य और तबाह होते परिवार इस अवैध नेटवर्क का सबसे पहला और आसान शिकार बन रहा है क्षेत्र का युवा वर्ग और दिहाड़ी मजदूर। ‘कम समय में अमीर बनने’ का मरुद्यान दिखाकर इन युवाओं को दलदल में धकेला जा रहा है। नतीजा?
मेहनत की कमाई सट्टे की भेंट चढ़ रही है।
- घरों के चूल्हे बुझ रहे हैं और परिवारों में मानसिक व आर्थिक कलह बढ़ रही है।
सट्टे की लत को पूरा करने के लिए युवा अपराध की राह पर कदम बढ़ा रहे हैं।
यह सिर्फ पैसों का नुकसान नहीं है, यह एक पूरी पीढ़ी के नैतिक और सामाजिक पतन की दास्तान है।
कानून के इकबाल पर उठते गंभीर सवाल।
सवाल यह उठता है कि जब यह सब कुछ स्थानीय लोगों को पता है, नामजद चेहरे सामने हैं, तो झगराखांड पुलिस और जिला प्रशासन की आंखें बंद क्यों हैं? इतना ही नहीं, मनेन्द्रगढ़ के रेलवे फाटक के पास रेलवे की जमीन पर खुलेआम इस अवैध कारोबार का संचालित होना और संचालकों की कथित ‘ऊंची यारी’ (साठगांठ) के चर्चे, प्रशासन की निष्पक्षता पर गहरा दाग लगाते हैं। क्या यह मान लिया जाए कि कानून के हाथ इन ‘सेठों के सेठों’ की पहुंच के आगे छोटे पड़ गए हैं? या फिर इस पूरे संगठित नेटवर्क को किसी अदृश्य रसूखदार का मूक संरक्षण प्राप्त है?
कड़वा सच: “जब रक्षक ही मौन साध लें या फिर ‘यारी’ निभाना शुरू कर दें, तो भक्षक बेखौफ होकर समाज की नसें काटने लगते हैं।”
अब निर्णायक कार्रवाई की जरूरत।
प्रशासन को यह समझना होगा कि यह केवल सट्टा पट्टी का मामला नहीं है, बल्कि एक संगठित डिजिटल अपराध (Organized Cyber Crime) है। इस नेटवर्क को तोड़ने के लिए केवल ‘चिल्लर पार्टी’ (छोटे गुर्गों) को पकड़कर औपचारिकता पूरी करने से काम नहीं चलेगा। जब तक मुख्य सरगनाओं—पंकज, दिवाकर और मनेन्द्रगढ़ रेलवे फाटक के पास सक्रिय सफेदपोश आकाओं पर कड़ा कानूनी शिकंजा नहीं कसा जाता, तब तक इस जाल को काटना नामुमकिन है।उच्च अधिकारियों को तुरंत इस मामले का संज्ञान लेना चाहिए। झगराखांड पुलिस की भूमिका की जांच होनी चाहिए और साइबर सेल की मदद से इस पूरे व्हाट्सएप नेटवर्क को ध्वस्त किया जाना चाहिए। जनता का आक्रोश फूटने से पहले प्रशासन को नींद से जागना होगा, वरना डिजिटल सट्टे का यह केंसर पूरे एमसीबी जिले को अपनी चपेट में ले लेगा।




