रिक्शा गायब, स्वच्छता ग्राही नदारद और फिर भी श्रमदान का ढोल! आखिर यह कैसा ‘उल्टा चश्मा’ मॉडल?

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रायपुर/मनेंद्रगढ़ – स्वच्छता केवल फोटो खिंचवाने का विषय नहीं है, बल्कि यह जवाबदेही, पारदर्शिता और जनहित से जुड़ा गंभीर विषय है। लेकिन जब ग्राम पंचायतों में स्वच्छता के नाम पर खरीदे गए संसाधन ही गायब होने लगें, स्वच्छता ग्राही मैदान से नदारद हों और दूसरी ओर श्रमदान के नाम पर प्रचार का शोर सुनाई दे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह व्यवस्था चल कैसे रही है?

ग्राम पंचायत केल्हारी और चांवरीडाड़ में स्वच्छता कार्यों के लिए खरीदे गए कचरा संग्रहण रिक्शों को लेकर अब चर्चाएं तेज हैं। यदि पंचायतों ने सरकारी धन से रिक्शा खरीदा था, तो वह आज कहां है? क्या वह उपयोग में है, खराब हो गया है, कबाड़ में बदल गया है या फिर किसी और दिशा में चला गया? इसका जवाब जनता जानना चाहती है।

दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि स्वच्छता ग्राही ही सक्रिय नहीं हैं, नियमित कचरा कलेक्शन नहीं हो रहा है, बाजारों और मोहल्लों में कचरा दिखाई दे रहा है, तो फिर श्रमदान के नाम पर किए जा रहे आयोजनों का वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या यह स्थायी समाधान है या केवल तस्वीरों और रिपोर्टों के लिए किया जाने वाला प्रदर्शन?

विडंबना यह है कि जिन पंचायतों में स्वच्छता व्यवस्था की मूलभूत जिम्मेदारियां पूरी होती नहीं दिख रहीं, वहीं श्रमदान को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यदि रोजमर्रा की सफाई व्यवस्था मजबूत होती, कचरा संग्रहण नियमित होता और खरीदे गए संसाधन धरातल पर दिखाई देते, तो श्रमदान प्रेरणादायक पहल कहलाता। लेकिन जब मूल व्यवस्था ही सवालों के घेरे में हो, तब श्रमदान का तमाशा जनता को “उल्टा चश्मा” ही नजर आता है।

सरकारी योजनाओं का उद्देश्य लोगों को सुविधाएं देना है, न कि आंकड़ों और तस्वीरों का खेल खेलना। यदि पंचायतों में खरीदे गए रिक्शे गायब हैं, तो उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि स्वच्छता ग्राही काम नहीं कर रहे, तो उसके कारणों की जांच होनी चाहिए। और यदि श्रमदान केवल कमियों को छिपाने का माध्यम बन रहा है, तो यह जनता के विश्वास के साथ छल है।

आज जरूरत इस बात की है कि संबंधित अधिकारी यह स्पष्ट करें कि स्वच्छता मद में खर्च हुए धन का उपयोग कहां हुआ, खरीदे गए रिक्शे किस स्थिति में हैं और गांवों में नियमित सफाई व्यवस्था क्यों दिखाई नहीं दे रही। क्योंकि जनता अब केवल नारों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखने वाले परिणामों से संतुष्ट होगी।

स्वच्छता का असली अर्थ झाड़ू हाथ में लेकर फोटो खिंचवाना नहीं, बल्कि व्यवस्था को इस तरह खड़ा करना है कि कचरा पैदा होने से लेकर उसके निस्तारण तक की पूरी श्रृंखला ईमानदारी से काम करे। वरना जनता पूछती रहेगी— रिक्शा कहां गया, स्वच्छता ग्राही कहां गए और यह श्रमदान आखिर किस बात का?

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