कभी दिल और संवेदनाओं से भी देश के वीरों का कर्ज चुकाया कीजिए !
छत्तीसगढ़ दबंग न्यूज। रायपुर। जब देश का एक जवान सीमा पर या आंतरिक सुरक्षा में अपने प्राणों की आहुति देता है, तो पूरा देश उसे नमन करता है। लेकिन जब उसी शहीद के बलिदान के बाद उसके परिवार को एक अदद सम्मान और मूर्ति की सही स्थापना के लिए अधिकारियों के चक्कर काटने पड़ें, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। रायपुर में शहीद आकाश राव गिरपुंजे की मूर्ति को लेकर निगम प्रशासन के रवैये ने एक बार फिर सिस्टम की संवेदनशीलता को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
‘विस्तार न्यूज़’ के लोकप्रिय डिबेट शो ‘सीधे मुद्दे की बात’ में प्रखर पत्रकार और एंकर ज्ञानेंद्र तिवारी ने इस लापरवाही के खिलाफ न सिर्फ आवाज़ उठाई, बल्कि सत्ता के नशे में चूर अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारी का पुरज़ोर एहसास कराया।
बयान पर भड़के ज्ञानेंद्र तिवारी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जब रायपुर नगर निगम के कमिश्नर संबित मिश्रा से इस संबंध में सवाल पूछा गया, तो उनका जवाब बेहद निराशाजनक और गैर-जिम्मेदाराना था। उन्होंने कैमरे के सामने कहा, “इसके बारे में मुझे जानकारी नहीं है, पता चलेगा तो बताऊंगा। यह चीज पूछना है तो पहले बताया करो।”
कमिश्नर के इसी रुख पर एंकर ज्ञानेंद्र तिवारी का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने ऑन-एयर कमिश्नर को टोकते हुए कहा:
”निगम कमिश्नर साहब, आप पहले से पता करके रखा करिए! जिस तरह से आप बैठे हैं और कह रहे हैं कि ‘पहले क्यों नहीं बताया’, आपको अंदाज़ा भी है कि एक शहीद का परिवार उसके जाने के बाद कितनी तकलीफ में होता है? क्या आपको इस मामले का फॉलो-अप खुद नहीं लेना चाहिए था?”
एक पिता के आंसू और सरकारी तंत्र का ठंडा रवैया।
खबर के दौरान वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि शहीद के बुजुर्ग पिता अपनी आँखों के आंसू पोंछते हुए दर्द बयां कर रहे हैं। वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि उनके शहीद बेटे की मूर्ति को पूरे सम्मान के साथ सही ढंग से स्थापित किया जाए।
ज्ञानेंद्र तिवारी ने बेहद भावुक और तीखे लहजे में कहा, “एक पिता ने अपना सहारा खो दिया, एक पत्नी ने पति और बच्चों ने अपने पिता को खो दिया। इतना सब खोने के बाद प्रशासन का यह ‘एटीट्यूड’ बिल्कुल ठीक नहीं है। किसी का बेटा जाता है तो भावनाएं जुड़ी होती हैं, कभी-कभी सिर्फ सरकारी सिस्टम के तहत नहीं, बल्कि इंसानियत के नाते भी बात कर लेनी चाहिए।”
क्यों खास है ज्ञानेंद्र तिवारी की यह पत्रकारिता ?
आज के दौर में जहाँ मीडिया अक्सर टीआरपी की होड़ में उलझा रहता है, वहीं ज्ञानेंद्र तिवारी की यह रिपोर्टिंग साबित करती है कि पत्रकारिता का असली धर्म आज भी जिंदा है।
सवालों में धार, दिल में संवेदना: उन्होंने न केवल अधिकारी से तीखे सवाल पूछे, बल्कि पीड़ित परिवार के दर्द को अपनी आवाज़ दी।
अधिकारियों की जवाबदेही तय करना: एक जिम्मेदार पत्रकार की तरह उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों को यह याद दिलाया कि वे जनता के सेवक हैं, शासक नहीं।
जनता की मांग: शहीदों का अपमान बर्दाश्त नहीं !
विस्तार न्यूज़ की इस एक्सक्लूसिव कवरेज के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों का गुस्सा उबल पड़ा है। जनता मांग कर रही है कि शहीद आकाश राव गिरपुंजे के स्मारक को तुरंत पूरे राजकीय सम्मान के साथ ठीक किया जाए और गैर-जिम्मेदाराना बयान देने वाले अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो।




