पर्यावरण दिवस पर ‘पौधरोपण’ का दिखावा, धधकते जंगलों और भ्रष्टाचार पर वन विभाग की ‘चुप्पी’ सवालों के घेरे में

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कोरिया। विश्व पर्यावरण दिवस पर 4 हजार पौधों का रोपण कर वन विभाग ने अपनी पीठ भले ही थपथपा ली हो, लेकिन कोरिया और रामगढ़ के सुलगते जंगल विभाग के दावों की पोल खोल रहे हैं। एक तरफ विभाग ‘हरित आवरण’ बढ़ाने के बड़े-बड़े उपदेश दे रहा है, तो दूसरी तरफ धरातल पर जंगल आग और माफियाओं की भेंट चढ़ रहे हैं। क्या यह केवल ‘फोटो-सेशन’ और औपचारिकता की इति-श्री है, या फिर जानबूझकर रची गई बड़ी लापरवाही?

आग में झुलसती हरियाली, जवाबदेही तय करने में विभाग ‘नदारद’

​सोनहत-बैकुंठपुर मार्ग के घुघरा जंगलों में लगी भीषण आग ने हजारों छोटे-बड़े पौधों को राख में बदल दिया। ठीक यही हाल रामगढ़ (राष्ट्रीय उद्यान) के मेण्ड्रा बैरियर के पास देखने को मिला, जहाँ आग ने जंगल का बड़ा हिस्सा स्वाहा कर दिया।

  • सवाल: इतनी बड़ी तबाही के बाद भी किसी परिक्षेत्राधिकारी (रेंजर), डिप्टी रेंजर या बीट गार्ड पर कोई दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
  • लापरवाही का आलम: जब जंगल जल रहे थे, तब पूरा अमला ‘मार्च क्लोजिंग’ के आंकड़ों को चमकाने में व्यस्त था। ‘फायर वाचर’ जैसे सुरक्षा बल गायब रहे। आखिर आग से जंगलों को बचाने की जिम्मेदारी किसकी है?

लकड़ी तस्करी: कार्रवाई या ‘खानापूर्ति’?

​वन्य संपदा की रक्षा का दम भरने वाला विभाग अवैध कटाई के मामलों में अक्सर ‘अदृश्य’ हो जाता है। सूत्रों के मुताबिक, पूर्व में पकड़े गए लकड़ी से लदे ट्रक के मामले में हाई-प्रोफाइल हस्तक्षेप के चलते मुख्य दोषियों को बचा लिया गया। यदि विभाग में शीर्ष पर बैठे अधिकारी खुद रसूखदारों के आगे नतमस्तक होंगे, तो वनों की सुरक्षा कौन करेगा?

निर्माण कार्यों की ‘घटिया गुणवत्ता’ और कमीशन का खेल

​पर्यावरण संरक्षण के नाम पर केवल पौधे नहीं लगाए जा रहे, बल्कि करोड़ों रुपये के तालाब, स्टॉप डैम और कूप निर्माण भी हो रहे हैं। मगर, धरातल पर ये निर्माण भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहे हैं।

  • सवाल: जो निर्माण कार्य पहली बारिश में ही ढह जाएं, उनकी जांच के लिए कोई अभियान कब चलेगा?
  • अंधेखी: अधिकारियों की नाक के नीचे चल रहे कमीशनखोरी के इस खेल पर डीएफओ की खामोशी मिलीभगत की ओर इशारा करती है।

निष्कर्ष: दिखावे की ‘नौटंकी’ से जंगल नहीं बचेंगे

​पौधरोपण का अभियान निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन यह तब तक बेमानी है जब तक मौजूद हज़ारों हेक्टेयर के जंगल सुरक्षित न हों। डीएफओ और पार्क प्रबंधन का ‘दौरे और भाषण’ तक सीमित रहना व्यवस्था पर सवाल उठाता है।

जनता की मांग:

क्या कोरिया वन विभाग में वनों की सुरक्षा के लिए ठोस और पारदर्शी तंत्र विकसित होगा? या फिर हर साल पर्यावरण दिवस पर केवल पौधों का दिखावा कर जनता की आंखों में धूल झोंकी जाती रहेगी?

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