जगतगुरु रामभद्राचार्य पर सियासी घमासान: नेताओं की ‘राजनीति’ बनाम जनता की ‘आस्था’

चिरमिरी (एमसीबी): हाल ही में स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल के निमंत्रण पर जगतगुरु रामभद्राचार्य जी का चिरमिरी आगमन हुआ। इस पावन कार्यक्रम के संपन्न होते ही सियासी गलियारों में बयानबाजी का ऐसा दौर शुरू हुआ कि मर्यादाएं तार-तार होती नजर आईं। एक ओर जहां नेताओं ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए धर्म को अखाड़ा बना लिया, वहीं दूसरी ओर आम जनता ने इन बयानों को समाज के लिए जहर बताया है।
नेताओं का ‘बयानवीर’ चेहरा: आस्था पर प्रहार?
जगतगुरु के आगमन के बाद कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के बयानों ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है:
चरणदास महंत (विधानसभा अध्यक्ष/नेता प्रतिपक्ष): उन्होंने विवादास्पद टिप्पणी करते हुए कहा, “मैं उन्हें जगतगुरु नहीं मानता, उन्हें गांव का गुरु भी नहीं मानता।” उनके इस बयान को साधु-संतों का अपमान माना जा रहा है।
टीएस सिंह देव (पूर्व स्वास्थ्य मंत्री): वरिष्ठ नेता सिंह देव ने भी सुर में सुर मिलाते हुए स्पष्ट कहा कि “मैं भी जगतगुरु को जगतगुरु नहीं मानता।”
ज्योत्सना महंत (सांसद, कोरबा): उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थिति तो दर्ज कराई, लेकिन मंच से कथा के दौरान की गई राजनीतिक बातों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि कथा के दौरान राजनीतिक प्रचार-प्रसार उचित नहीं है।
भूपेश बघेल (पूर्व मुख्यमंत्री): भूपेश बघेल के बयानों ने भी आग में घी डालने का काम किया है। भाजपा समर्थकों और संतों के अनुयायियों ने इसे पूरे साधु समाज का अपमान करार दिया है।
आम जनता का कड़ा रुख: ‘धर्म को राजनीति से अलग रखें’
नेताओं के इन बयानों के बीच एमसीबी जिले के बरबसपुर निवासी शिव प्रसाद साहू ने आम आदमी की आवाज बुलंद की है। उन्होंने तीखे लहजे में कहा:
“साधु-संतों को लेकर इस प्रकार की अमर्यादित टिप्पणी समाज में अनावश्यक तनाव पैदा करती है। नेताओं को धर्म और आस्था के विषयों को अपनी राजनीति से दूर रखना चाहिए। यह हम आम जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है।”
क्या कहता है विश्लेषक पक्ष?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में धर्म के नाम पर शुरू हुई यह ‘शब्द-युद्ध’ आने वाले समय में बड़े विवाद का रूप ले सकती है। जहां एक तरफ विपक्ष जगतगुरु की स्वीकार्यता पर सवाल उठा रहा है, वहीं सत्ता पक्ष इसे ‘हिंदू आस्था’ पर हमला बताकर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है।
निष्कर्ष: चिरमिरी की धरती से उठा यह विवाद अब पूरे राज्य में गूंज रहा है। सवाल यह नहीं है कि कौन जगतगुरु है और कौन नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या नेताओं को अपनी सियासी महत्वाकांक्षा के लिए सनातन संस्कृति के पूजनीय संतों का सार्वजनिक अपमान करने का अधिकार है? जनता ने साफ कर दिया है कि वे धर्म के चश्मे से राजनीति देखना नहीं, बल्कि संतों का सम्मान देखना चाहते हैं।
इस पूरे प्रकरण में नेताओं के बयानों ने राज्य की राजनीति को किस दिशा में मोड़ दिया है, क्या आपको लगता है कि धर्म और राजनीति का यह टकराव आने वाले चुनावों में कोई बड़ा मुद्दा बनेगा?




