छत्तीसगढ़ के कोरिया में दावों की खुली पोल: आजादी के दशकों बाद भी विकास की राह तकते वनांचल के आदिवासी
टापू बन जायेगा ग्राम गिधेर, सुध लेने की फुर्सत न अधिकारियों को न ही जनप्रतिनिधियों को
कोरिया। प्रदेश सरकारें हर दिन विकास के नए और ऊंचे दावे करती हैं। चमचमाती सड़कों और सुशासन के विज्ञापनों से इतर, छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले का एक हिस्सा ऐसा भी है जहाँ ‘विकास’ शब्द ही बेमानी हो चुका है। राज्य बनने के बाद सूबे ने पाँच सरकारें देख लीं, चेहरे बदले, वादे बदले, लेकिन सोनहत विकासखंड के आश्रित ग्राम गिधेर की बदहाली की तस्वीर आज भी जस की तस है। यहाँ पिछले 12 सालों से एक पुल टूटा पड़ा है, जिसके मलबे पर हर रोज सैकड़ों ग्रामीण अपनी जान हथेली पर रखकर नदी पार करने को मजबूर हैं। प्रशासन की इसी उपेक्षा के कारण आज यहाँ के गरीब आदिवासी अपनी नियति को कोस रहे हैं।
बरसात की आहट से कांप उठती है रूह, टापू बन जाता है गाँव
ग्राम पंचायत चंदहा के आश्रित ग्राम गिधेर में लगभग 30 से अधिक गरीब आदिवासी परिवार रहते हैं। ग्राम पंचायत मुख्यालय तक तो जैसे-तैसे पक्की सड़क पहुँच गई, लेकिन गिधेर आते-आते विकास दम तोड़ देता है।
गाँव के ही शिव प्रसाद, सियाराम, ईश्वर, नन्द लाल, राम मनोहर, सुरेश कुमार, मेही लाल और बसंत ने भरे गले से अपना दर्द बयां किया। उन्होंने कहा:
“कुछ ही दिनों में बरसात आने वाली है। आसमान में काले बादल देखते ही हमारी रूह कांप उठती है। नदी का पुल पूरी तरह टूट चुका है, जो अब मरम्मत के लायक भी नहीं रहा। मानसून आते ही नदी उफान पर होगी और हमारा गाँव पूरी दुनिया से कटकर एक ‘टापू’ में तब्दील हो जाएगा।”
बरसात के दिनों में यदि कोई गंभीर रूप से बीमार हो जाए या किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा हो, तो स्थिति भयावह हो जाती है। तेज बहाव के बीच उफनती नदी को पार करना साक्षात मौत को आमंत्रण देने जैसा होता है।
कंधे पर राशन, कीचड़ में फंसी ‘प्रधानमंत्री आवास’ की उम्मीदें
ग्रामीणों ने बताया कि गाँव में बुनियादी सुविधाओं जैसे—सड़क, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य का घोर अभाव है। स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी कभी-कभार ही यहाँ का रुख करते हैं। स्थिति यह है कि ग्रामीणों को अपने हक का राशन भी मीलों दूर से कंधे पर ढोकर, नदी के तेज बहाव के बीच से लाना पड़ता है। कई बार इस मशक्कत में राशन पानी में भीगकर खराब हो जाता है।
यही नहीं, सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘प्रधानमंत्री आवास’ के लिए जब कोई गरीब निर्माण सामग्री मंगवाता है, तो गाड़ियां घंटों नदी के मलबे और कीचड़ में फंसी रहती हैं। ग्रामीणों को खुद लगकर घंटों की मशक्कत के बाद गाड़ियों को निकालना पड़ता है।
देवतीडांड, हर्राडी और कांटो की भी यही सिसकती कहानी
यह दर्द सिर्फ गिधेर का नहीं है। चंदहा के बगल की नवीन पंचायत नवाटोला के ग्राम देवतीडांड, हर्राडी और शेराडांड़ की कहानी भी ऐसी ही है। जर्जर रास्तों और खतरनाक घाटों के बीच यहाँ पीने के पानी का गंभीर संकट है। ग्रामीण झरिया (ढोढ़ी) और गंदे नाले का पानी पीने को मजबूर हैं, जिससे मासूम बच्चे अक्सर बीमारियों की चपेट में रहते हैं। गाँव के हैंडपंपों से लाल और दूषित पानी निकलता है।
वहीं, बंशीपुर पंचायत का आश्रित ग्राम कांटो तो प्रशासनिक क्रूरता की पराकाष्ठा है। ब्लॉक मुख्यालय से 70 किमी और घने जंगलों के बीच बसे इस गाँव में 25 लोग रहते हैं। यहाँ पोलिंग बूथ तो है, लेकिन बच्चों के लिए एक स्कूल तक नहीं है। आंगनबाड़ी भी किराए के एक कच्चे मकान में जैसे-तैसे सांसें ले रही है। यहाँ के आदिवासियों को राशन के लिए पैदल 25 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। आने-जाने में कुल 60 किलोमीटर की दूरी तय कर ये लोग कंधे पर राशन लाते हैं। बरसात में यह गाँव भी पूरी तरह संपर्क विहीन हो जाता है।
पूर्व विधायक ने जगाई थी उम्मीद की किरण
ग्रामीणों के मुताबिक, पूर्व विधायक गुलाब कमरो क्षेत्र के इकलौते ऐसे जनप्रतिनिधि रहे, जो हर्राडीह, देवतीडांड और कचोहर जैसे सुदूर गांवों तक पहुँचे थे। उन्होंने ग्रामीणों की मांग पर नवाटोला और देवतीडांड के बीच एक बड़े नदी पुल की घोषणा की थी, जो स्वीकृत हुआ और एक बन कर तैयार है दूसरा का काम वर्तमान में स्वीकृत होकर चल रहा है। इस पुल से बड़ी राहत तो मिलेगी, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि जब तक हर्राडीह में एक और आवश्यक पुल तथा गिधेर के टूटे पुल की जगह नया पुल नहीं बनता, तब तक उनकी आदिम लाचारी खत्म नहीं होगी।
गिधेर की आवाज बनेंगे पुष्पेंद्र: कोरिया जन सहयोग समिति
हाल ही में कोरिया जन सहयोग समिति के अध्यक्ष पुष्पेंद्र राजवाड़े ने जमीनी हकीकत जानने के लिए गिधेर गाँव का दौरा किया। उन्होंने ग्रामीणों के बीच बैठकर उनका हालचाल जाना, राशन-पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाओं की जानकारी ली। पुष्पेंद्र राजवाड़े ने कहा, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि ग्रामीण इस आधुनिक दौर में भी ऐसी जिंदगी जी रहे हैं। हम इस समस्या से जिला प्रशासन को तत्काल अवगत कराएंगे और नए पुल के निर्माण के लिए मजबूती से आवाज उठाएंगे।”
राजनीति और आश्वासनों के बीच फंसा पुल: किसने क्या कहा?
“गिधेर गाँव में 12 साल से पुलिया टूटी है। यहाँ न तो कोई अधिकारी सुध लेने आता है और न ही कोई जनप्रतिनिधि। सरकार से हमारी गुहार है कि बरसात से पहले कुछ इंतजाम करें या नया पुल बनवाएं।”
— नंदकिशोर, स्थानीय ग्रामीण, गिधेर
“पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान कचोहर और देवतीडांड मार्ग में पुल स्वीकृत हुआ था, जिसमें एक बन गया एक का काम चालू है। गिधेर में भी नया पुल बने, इसके लिए हम एक बड़ा अभियान चलाकर मांग करेंगे।”
— अनित दुबे, कांग्रेस नेता
“गिधेर में पुल निर्माण की अत्यंत आवश्यकता को देखते हुए मुख्य मंत्री को मांग पत्र भेजेंगे से
— समय लाल कमलवंशी, भाजपा नेता
“मैंने इस संबंध में हाल ही में सांसद महोदया को पत्र लिखकर नवीन पुल निर्माण की पुरजोर मांग की है। इसके साथ ही जिला प्रशासन को भी जल्द ही एक मांग पत्र सौंपा जाएगा ताकि आदिवासियों को इस नरकीय जीवन से मुक्ति मिले।”
— ज्योत्स्ना राजवाड़े, पूर्व जिला पंचायत सदस्य
कब बनेगा पुल बना बड़ा सवाल
सियासी गलियारों में चिट्ठियों और आश्वासनों का दौर जारी है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कुछ ही दिनों में मानसून दस्तक देने वाला है। देखना होगा कि इस बार भी गिधेर के आदिवासियों की किस्मत में ‘टापू’ बनकर सिसकना ही लिखा है, या फिर इस बार शासन-प्रशासन की नींद टूटेगी और इन बेबस ग्रामीणों को उनका हक मिल पाएगा।




