कोरिया। सोनहत वन परिक्षेत्र में बाबू दिनेश द्विवेदी की करीब 12 वर्षों से एक ही जगह पदस्थापना ने विभागीय व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इतने लंबे समय से एक ही जगह जमे रहने के बीच अब वन कार्यों की फाइलों पर भी सवाल उठ रहे हैं। मामला ऐसा है कि ‘दाल में कुछ काला’ नजर आने लगा है और दूध का दूध, पानी का पानी होना जरूरी हो गया है।
तालाब निर्माण से लेकर मजदूरी भुगतान तक रिकॉर्ड की जांच की जरूरत है। सबसे बड़ा सवाल मस्टर रोल पर है—जिन नामों पर हाजिरी चढ़ी, क्या वे लोग सच में फावड़ा लेकर मैदान में उतरे थे? यदि मजदूरी नहीं करने वाले लोगों के नाम पर भुगतान हुआ है तो सरकारी रकम आखिर किसके इशारे पर निकली?
मस्टर रोल खोलेगा पोल
मस्टर रोल, मजदूरी भुगतान और बैंक खातों का मिलान कराया जाए तो कागजों में दौड़ रहे मजदूरों की हकीकत सामने आ सकती है। कौन कितने दिन काम पर था, किसके नाम पर कितनी मजदूरी निकली और पैसा किस खाते में पहुंचा—इन सवालों का जवाब रिकॉर्ड में मौजूद है।
कागजों का खेल है या जमीन पर काम? इसका फैसला सिर्फ फाइल देखकर नहीं, बल्कि दर्ज मजदूरों के मौके पर सत्यापन से होना चाहिए।
तालाब में पानी, फाइल में हिसाब—पर जमीन पर कितना काम?
तालाब निर्माण कार्यों की स्वीकृति, माप पुस्तिका, मजदूरी भुगतान और वास्तविक निर्माण का मिलान भी जरूरी है। यदि कागज कुछ और और जमीन कुछ और बताती है तो ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ वाली कार्रवाई से काम नहीं चलेगा।
12 साल की कुर्सी, अब खुले हिसाब की बारी
एक ही परिक्षेत्र में 12 वर्षों की पदस्थापना पर विभाग को जवाब देना चाहिए। इतने लंबे कार्यकाल में हुए कामों की वर्षवार फाइलें खोलकर जांच, मस्टर रोल का भौतिक सत्यापन और भुगतान का बैंक रिकॉर्ड से मिलान कराया जाए।
अब सवाल यह नहीं कि ‘किसने क्या कहा’, सवाल यह है कि सरकारी रिकॉर्ड क्या कहता है।





