मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (MCB) जिले के विकास की गाड़ी इन दिनों अजीबोगरीब ‘ब्रेक’ का शिकार है। यह ब्रेक किसी तकनीकी खराबी से नहीं, बल्कि प्रशासनिक जड़ता और ‘भाई-राज’ की बेड़ियों से लगा है। जिला पंचायत के गलियारों से लेकर सुदूर अंचलों की ग्राम पंचायतों तक एक ही शोर है—ठेकेदार बेबस हैं, और जनता त्रस्त।
इंजीनियरों की मेहरबानी या कमीशन का खेल?
ग्राम पंचायतों में चल रहे निर्माण कार्यों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। गुणवत्ता के नाम पर रेत और मिट्टी के महल खड़े किए जा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल उन इंजीनियरों पर उठता है, जिनकी नाक के नीचे ये ‘अनोखे कारनामे’ हो रहे हैं। आखिर किसकी शह पर मानक विहीन निर्माणों को ‘सर्टिफिकेट’ दिया जा रहा है? क्या यह तकनीकी अयोग्यता है, या फिर कमीशनखोरी का कोई नया गणित? यह संदेह अब जनता के विश्वास को तार-तार कर रहा है।
सीईओ की ‘वातानुकूलित’ कार्यशैली सूत्र।
जिले की प्रशासनिक मुखिया, जिला पंचायत सीईओ अंकिता सोम की कार्यशैली पर उठे सवाल केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि नैतिक भी हैं। कहा जाता है कि प्रशासनिक अधिकारी कुर्सी के नहीं, जनता के सेवक होते हैं। लेकिन, MCB के ग्रामीण इलाकों के लिए सीईओ का दौरा आज भी एक ‘पहेली’ बना हुआ है। न कोई धरातल पर विजिट, न ही आम लोगों से सीधा संवाद। सूत्र बताते हैं शायद सीईओ साहिबा को यह बताने वाला कोई नहीं कि फाइलों में दर्ज ‘विकास’ और सड़क की ‘धूल’ में जमीन-आसमान का अंतर होता है।
कतारों में खड़ी उम्मीद और प्रशासनिक संवेदनहीनता।
एक तरफ जिला कलेक्टर के जन-दर्शन में लंबी होती फरियादियों की कतारें हैं, जहाँ हजारों शिकायतें लंबित हैं—पानी, बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए। दूसरी तरफ प्रशासन की कुंभकर्णीय नींद है। यह विडंबना ही है कि जनता अपनी ही चुनी हुई व्यवस्था के सामने गिड़गिड़ा रही है और जिम्मेदार अधिकारी ‘भाई-राज’ की छत्रछाया में मस्त हैं।




