
रायपुर। छत्तीसगढ़ के ‘फेफड़े’ कहे जाने वाले हसदेव अरण्य पर मंडराते विनाश के बादलों के बीच प्रदेश की राजनीति में महासंग्राम छिड़ गया है। हसदेव में 7 लाख से अधिक पेड़ों की प्रस्तावित कटाई ने राज्य को एक बड़े जन-आंदोलन की दहलीज पर ला खड़ा किया है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव के बगावती सुरों को अपना समर्थन देते हुए भाजपा सरकार के खिलाफ ‘आर-पार’ की लड़ाई का शंखनाद कर दिया है।
”विधानसभा का अपमान, लोकतंत्र का चीरहरण”।
डॉ. महंत ने सरकार पर सीधा प्रहार करते हुए कहा कि, “हसदेव का विनाश महज पेड़ों की कटाई नहीं, बल्कि विधानसभा द्वारा सर्वसम्मति से पारित संकल्प का खुला अपमान है।” उन्होंने इसे आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन पर सुनियोजित हमला करार दिया है। डॉ. महंत ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि कांग्रेस इस मुद्दे को केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रखेगी, बल्कि ‘सड़क से लेकर सदन तक’ इसे एक जन-आंदोलन बनाएगी।
कोयला बनाम भविष्य: सरकार की मंशा पर खड़े किए सवाल।
नेता प्रतिपक्ष ने नई कोयला खदानों की औचित्यहीनता को साबित करने के लिए ठोस तर्क पेश करते हुए सरकार के विकास के मॉडल को आईना दिखाया है सौर ऊर्जा का युग जब दुनिया और भारत तेजी से सौर और पवन ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं, तो हसदेव के जंगलों को नष्ट करना संकीर्ण सोच है।कोयले की घटती उपयोगिता: विशेषज्ञ भी मान रहे हैं कि 2035 के बाद कोयले की वैश्विक मांग में भारी गिरावट आएगी। ऐसे में आने वाली पीढ़ियों के लिए आज के पर्यावरण को बर्बाद करना एक ऐतिहासिक भूल होगी।भंडारों की कमी नहीं छत्तीसगढ़ के पास पहले से पर्याप्त कोयला भंडार उपलब्ध हैं, फिर भी सरकार विनाशकारी खदानों पर क्यों तुली है? क्या यह किसी बड़े ‘कॉरपोरेट हित’ को साधने की कोशिश है?
’आदिवासी अस्मिता’ बनाम ‘कॉरपोरेट लाभ’।
यह मामला अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता और उनके अस्तित्व की रक्षा का सवाल बन गया है। डॉ. महंत ने स्पष्ट किया है कि हसदेव की पहाड़ियों और वहां की जैव विविधता को नष्ट करके जो ‘विकास’ परोसा जा रहा है, वह असल में विनाश की पटकथा है।
क्या आने वाले दिनों में उबल पड़ेगा छत्तीसगढ़?
डॉ. चरणदास महंत और टी.एस. सिंहदेव का एक मंच पर आना यह संकेत देता है कि कांग्रेस अब पूरी तरह आक्रामक मोड में है। हसदेव अरण्य का मुद्दा अब छत्तीसगढ़ की राजनीति का ‘केंद्र बिंदु’ बन चुका है। सरकार के लिए चुनौती बड़ी है—एक ओर कॉरपोरेट जगत की मांग है, तो दूसरी ओर छत्तीसगढ़ की अस्मिता और पर्यावरण बचाने का जन-दबाव।आने वाले दिनों में हसदेव का जंगल फिर से छत्तीसगढ़ की सियासत का सबसे तप्त केंद्र बनने जा रहा है, जहाँ सरकार का एक-एक निर्णय उसकी साख तय करेगा।




