स्वच्छता मिशन या भ्रष्टाचार का ‘मेकअप’? MCB जिले में ‘डेटिंग-पेंटिंग’ के जरिए सरकारी खजाने की खुली लूट!

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रायपुर/मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (MCB): छत्तीसगढ़ में एक ओर सुशासन और त्वरित निदान के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर MCB जिले से सामने आया शौचालय निर्माण घोटाला सरकारी तंत्र की कलई खोल रहा है। स्वच्छ भारत मिशन (SBM) जैसी पवित्र योजना यहाँ भ्रष्टाचार का पर्याय बन गई है।

क्या है ‘डेटिंग-पेंटिंग’ का यह शातिर खेल?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, MCB जिले में नए शौचालय बनाने के बजाय पहले से मौजूद शौचालयों पर मात्र पुताई (पेंट) और मामूली मरम्मत की जा रही है। इन पुराने शौचालयों को ही ‘नया’ बताकर नए हितग्राहियों के नाम पर 15वें वित्त आयोग की भारी-भरकम राशि का आहरण किया जा रहा है। यह सीधे तौर पर सरकारी फंड के साथ की गई धोखाधड़ी है।

सुशासन के दावों पर सवाल: जिला पंचायत अधिकारी की चुप्पी।

जिले में सुशासन कार्यक्रम के जरिए समस्याओं के समाधान के बड़े-बड़े वादे किए जा रहे हैं। ऐसे में जिला पंचायत अधिकारी अंकिता सोम की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न उठना लाजिमी है।क्या जिले की मुखिया को जमीनी स्तर पर हो रही इस धांधली की भनक नहीं है?सुशासन के दौर में भ्रष्टाचार की यह ‘सफेद हाथी’ जैसी योजना क्या प्रशासनिक मिलीभगत का प्रमाण नहीं है?

प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न।

यह घोटाला मात्र वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता है। सवाल यह है कि क्या बिना ग्राम पंचायत के सरपंचों, सचिवों और क्षेत्र के इंजीनियरों की मिलीभगत के इतना बड़ा घोटाला संभव है?विकास कार्यों की निगरानी करने वाला तंत्र आखिर किस मूक सहमति से इस खेल को चलने दे रहा है?

स्वच्छता का लक्ष्य: कोसों दूर, कागजों पर मशहूर।

स्वच्छ भारत मिशन का उद्देश्य हर घर में स्वच्छता सुनिश्चित करना था, लेकिन MCB में स्थिति उलट है।कागजों पर शौचालय बनकर तैयार हैं।जमीनी हकीकत ग्रामीण आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं और जनता का पैसा भ्रष्टाचारियों की जेब में जा रहा है।

तत्काल निष्पक्ष जांच और कड़ी कार्रवाई की मांग।

मामले की गंभीरता को देखते हुए जनता की ओर से निम्नलिखित मांगों पर तत्काल अमल होना चाहिए स्वतंत्र जांच मामले की भौतिक सत्यापन (Physical Verification) जिला स्तरीय अधिकारियों के बजाय किसी उच्च स्तरीय या राज्य स्तरीय एजेंसी से कराई जाए।दोषियों पर प्रहार उन सभी सरपंचों, सचिवों और इंजीनियरों की भूमिका की जांच हो जिनके कार्यकाल में ये ‘पुराने शौचालय नए बनकर’ पास हुए हैं।वसूली और दंड गबन की गई राशि की वसूली हो और दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए ताकि भ्रष्टाचार को ‘जीरो टॉलरेंस’ के साथ खत्म किया जा सके।

निष्कर्ष:

स्वच्छ भारत मिशन के नाम पर चल रही यह ‘लीपापोती’ विकास के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए पर्याप्त है। स्वच्छता का संकल्प तब तक पूरा नहीं होगा जब तक प्रशासनिक भ्रष्टाचार की गंदगी को जड़ से नहीं मिटाया जाएगा। क्या जिला प्रशासन अपनी साख बचाने के लिए इस मामले में दोषियों पर कार्रवाई करेगा?

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