भारतीय चिकित्सक दिवस विशेष: तीन पीढ़ियों के अनोखे संयोग की बेहद भावुक कहानी

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मनेंद्रगढ़ से प्रदीप पाटकर की विशेष रिपोर्ट।रायपुर/मनेंद्रगढ़: कहते हैं कि बुजुर्गों के देखे हुए सपने और उनके दिए संस्कार कभी जाया नहीं जाते। अगर बेटा समय के चक्र में उन सपनों को पूरा न कर पाए, तो वक्त घूमकर आता है और पोती उस ख्वाब को हकीकत में बदल देती है। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल के परिवार की यह कहानी ‘नेशनल डॉक्टर्स डे’ के मौके पर हर दिल को छू लेने वाली है।

वाई-फाई बैकग्राउंड: रतनपुर के किसान का वह ‘सफेद कोट’ वाला सपना

एमसीबी जिले के खड़गवां ब्लॉक के रतनपुर गांव के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे श्यामबिहारी जायसवाल के पिता स्वर्गीय सुरजदीन जायसवाल की दिली ख्वाहिश थी कि उनका बेटा पढ़-लिखकर डॉक्टर बने। पिता चाहते थे कि बेटा गले में स्टेथोस्कोप लटकाए और सफेद कोट पहनकर मरीजों का इलाज करे। पिता ने इसके लिए कड़ा संघर्ष भी किया, लेकिन नियति ने श्यामबिहारी जायसवाल के लिए एक अलग ही रास्ता चुन रखा था।

यू-टर्न: बेटे ने चुना जनसेवा का रास्ता, आज संभाल रहे स्वास्थ्य मंत्रालय

पिता के सपने के उलट, श्यामबिहारी जायसवाल का रुझान छात्र जीवन से ही जनसेवा और राजनीति की तरफ हो गया। उन्होंने एमएससी (M.Sc.) करने के बाद कदम आगे बढ़ाया और जमीनी राजनीति में उतर गए:

  • पहले जनपद सदस्य का चुनाव जीता।
  • फिर खड़गवां के जनपद उपाध्यक्ष बने।
  • इसके बाद विधानसभा का चुनाव लड़कर विधायक बने।

उतार-चढ़ाव भरे राजनीतिक सफर के बाद आज वे छत्तीसगढ़ सरकार में बेहद महत्वपूर्ण स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। बेटा खुद तो डॉक्टर नहीं बन पाया, लेकिन आज यह सुखद संयोग है कि पूरे प्रदेश के डॉक्टरों और स्वास्थ्य व्यवस्था की कमान उसी बेटे के हाथों में है।

द क्लाइमेक्स: कंचन बनीं ‘डॉक्टर’, ऐसे पूरा हुआ दादा का अधूरा ख्वाब

भले ही श्यामबिहारी जायसवाल डॉक्टर नहीं बन सके, लेकिन उनके पिता की वह इच्छा परिवार के संस्कारों में जिंदा रही। उनकी बेटी कंचन जायसवाल ने बचपन से ही अपने दादा के इस अधूरे सपने को महसूस किया और चिकित्सा क्षेत्र को अपनी जिंदगी का लक्ष्य बना लिया। डॉ. कंचन जायसवाल ने दिन-रात कड़ी मेहनत की और मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर आखिरकार अपने दादा का वह सपना सच कर दिखाया।

सादगी की मिसाल: रसूखदार पिता की बेटी, पर वीआईपी कल्चर से दूरी

कॉलेज के दिनों में एक कद्दावर नेता और मंत्री की बेटी होने के बावजूद कंचन ने कभी वीआईपी कल्चर (VIP Culture) नहीं अपनाया। वे मेडिकल कॉलेज में आम छात्रों की तरह बेहद सादगी से रहीं। आज डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी होने और शादी के बाद अपने नए जीवन में कदम रखने के बाद भी, दादा और पिता से मिले सादगी के यह संस्कार उनके साथ बरकरार हैं।

सबसे भावुक क्षण: जब ‘डॉक्टर’ शब्द सुनकर नम हो गईं स्वास्थ्य मंत्री की आंखें

स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल की पत्नी कांति जायसवाल बताती हैं कि जब कंचन के नाम के आगे आधिकारिक रूप से ‘डॉक्टर’ लगा, तो स्वास्थ्य मंत्री की आंखें भी नम हो गई थीं। उनके लिए यह सिर्फ बेटी की कामयाबी नहीं थी, बल्कि अपने स्वर्गीय पिता के प्रति एक बेटे की तरफ से सबसे सच्ची और सबसे बड़ी श्रद्धांजलि थी।

पवित्र सपने कभी नहीं मरते

डॉक्टर्स डे पर जायसवाल परिवार का यह सफरनामा हमें सिखाती है कि पारिवारिक मूल्य और पवित्र सपने कभी नहीं मरते। बेटा डॉक्टर नहीं बना तो क्या, आज वह पूरे प्रदेश का ‘उपचार’ करने वाली व्यवस्था का मुखिया (स्वास्थ्य मंत्री) है, और पिता का वह व्यक्तिगत सपना आज उनकी बेटी डॉ. कंचन के रूप में धरती पर मरीजों की सेवा के लिए मुस्कुरा रहा है।

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