कल्पवृक्ष का यह वरदान: सरई वनों की धड़कन और आदिवासी संस्कृति का अटूट श्रृंगार

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प्रदीप पाटकर। मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर

​छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (MCB) जिले की भौगोलिक पहचान केवल पहाड़ों और घाटियों तक सीमित नहीं है। यहाँ की हवाओं में घुली ‘सरई’ (साल) की भीनी-भीनी सुगंध और जंगलों के भीतर बसती एक प्राचीन संस्कृति, इसे देश के अन्य हिस्सों से अलग खड़ा करती है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर, यह जानना अनिवार्य है कि कैसे सरई के ये वन इस अंचल के लिए महज पेड़ नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार हैं।

आदिवासी जीवन का ‘अक्षयपात्र’

​स्थानीय जनजातीय समुदायों के लिए सरई साक्षात देवता और कल्पवृक्ष है। यहाँ के ‘सरना स्थलों’ (पवित्र उपवन) में सरई की उपस्थिति किसी मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा से कम नहीं। लेकिन, इस आस्था के साथ-साथ सरई जीवन जीने का एक कुशल अर्थतंत्र भी है। गर्मियों में जब जंगल अपनी कोमल नई पत्तियों और फूलों से लद जाते हैं, तब आदिवासी परिवारों के लिए आजीविका का एक नया अध्याय शुरू होता है।

​सरई के बीज, गोंद और पत्तों का संग्रहण यहाँ के आदिवासियों के लिए ‘ग्रीन गोल्ड’ की तरह है। एक ओर जहाँ इनके दोने-पत्तल और औषधीय गुण उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं, वहीं दूसरी ओर सरई के बीजों की बाजार में बढ़ती मांग ने इसे उनके आर्थिक संबल का सबसे बड़ा जरिया बना दिया है।

पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़

​मनेंद्रगढ़ का यह क्षेत्र सरई वनों का एक ऐसा ‘द्वीप’ है, जो जलवायु परिवर्तन के इस दौर में पर्यावरण को संतुलित रखने का काम कर रहा है। वन विभाग के डीएफओ चंद्र कुमार अग्रवाल के अनुसार, सरई के ये घने वन हमारे ईकोसिस्टम की धड़कन हैं। विभाग अब इसे केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि एक ‘संपूर्ण आर्थिक-पर्यावरणीय मॉडल’ के रूप में देख रहा है। वैज्ञानिक संरक्षण और अवैध कटाई पर सख्ती के जरिए इन वनों को सुरक्षित रखने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस प्राकृतिक धरोहर को देख सकें।

क्यों जरूरी है इस ‘हरित-श्रृंगार’ का संरक्षण?

​सवाल सिर्फ एक पेड़ को बचाने का नहीं है, बल्कि एक पूरी संस्कृति को अक्षुण्ण रखने का है। सरई का जंगल अगर उजड़ता है, तो आदिवासियों की आस्था का केंद्र, उनकी आजीविका और उनकी परंपरागत औषधि प्रणाली—सब कुछ विलुप्त होने की कगार पर आ जाएगा।

​इस विश्व पर्यावरण दिवस पर, हमें यह संकल्प लेना होगा कि तरक्की की अंधी दौड़ में हम अपनी जड़ों को न भूलें। यदि सरई का यह कल्पवृक्ष सुरक्षित है, तभी वनांचल की यह समृद्ध संस्कृति और हमारा पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। यह समय है कि हम इन वनों को अपनाएं, इन्हें पूजें और इनके संरक्षण में आदिवासियों के साथ मिलकर सक्रिय भागीदारी निभाएं।

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