वर्षों से एक ही जगह जमे दिनेश द्विवेदी पर गंभीर आरोप, फर्जी हाजिरी और अनियमितताओं की जांच की मांग
सोनहत। कोरिया वन मंडल के सोनहत वन परिक्षेत्र में इन दिनों एक बाबू की कथित पकड़ और वर्षों से एक ही जगह जमे रहने को लेकर सवाल तेज हो गए हैं। दिनेश द्विवेदी की लंबे समय से सोनहत में पदस्थापना को लेकर स्थानीय स्तर पर चर्चाएं और शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है।
शिकायतों में फर्जी हाजिरी, मस्टर रोल में कथित गड़बड़ी और विभागीय कार्यों में अनियमितता जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो मामला महज एक कर्मचारी की कार्यप्रणाली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे वन परिक्षेत्र की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।
सवाल यह—एक ही जगह वर्षों से क्यों?
सरकारी व्यवस्था में लंबे समय तक एक ही संवेदनशील स्थान पर पदस्थ रहने वाले कर्मचारी को लेकर पारदर्शिता और प्रशासनिक निगरानी बेहद जरूरी होती है। ऐसे में सवाल उठता है कि दिनेश द्विवेदी वर्षों से सोनहत में कैसे जमे हुए हैं?
क्या विभाग में तबादला नीति लागू नहीं होती?
क्या उनकी कार्यप्रणाली की कभी विस्तृत समीक्षा हुई?
क्या हाजिरी और भुगतान संबंधी रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच कराई गई?
इन सवालों का जवाब कोरिया वन मंडल के जिम्मेदार अधिकारियों को देना चाहिए।
फर्जी हाजिरी के आरोपों की जांच हुई तो खुल सकता है बड़ा खेल
सबसे गंभीर आरोप फर्जी हाजिरी से जुड़े बताए जा रहे हैं। यदि मस्टर रोल और हाजिरी रजिस्टर में दर्ज नामों की वास्तविक मजदूरों से मौके पर जांच कराई जाए तथा संबंधित भुगतान अभिलेखों का मिलान किया जाए, तो स्थिति साफ हो सकती है।
सवाल यह भी है कि जिन कार्यों में मजदूरों की हाजिरी दिखाई गई, क्या वास्तव में उतने मजदूर मौके पर काम कर रहे थे? यदि नहीं, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी और सरकारी धन की कथित गड़बड़ी की भरपाई कौन करेगा?
‘बाबू की पकड़’ की चर्चा, विभाग की चुप्पी पर सवाल
स्थानीय स्तर पर दिनेश द्विवेदी के प्रभाव को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। आरोप लगाने वालों का कहना है कि लंबे समय से एक ही जगह रहने के कारण उनकी विभागीय व्यवस्था पर पकड़ मजबूत हो गई है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन इतने गंभीर आरोपों के बाद विभागीय जांच से स्थिति स्पष्ट करना प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है।
रिकॉर्ड सार्वजनिक हों, दूध का दूध और पानी का पानी हो
मामले में अब केवल मौखिक सफाई पर्याप्त नहीं होगी। जरूरत है कि संबंधित अवधि के मस्टर रोल, हाजिरी रजिस्टर, भुगतान विवरण, कार्यादेश और संबंधित विभागीय रिकॉर्ड की जांच कराई जाए।
यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक हुआ है तो जांच के बाद आरोप स्वतः निराधार साबित हो जाएंगे। और यदि अनियमितता मिली, तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
अब असली सवाल यह है—क्या कोरिया वन मंडल के अधिकारी सोनहत वन परिक्षेत्र में वर्षों से जमे बाबू की भूमिका की निष्पक्ष जांच कराएंगे, या फिर ‘बाबू राज’ की यह कहानी यूं ही चलती रहेगी?






