“त्योहारों पर करोड़ों के प्रचार, आदिवासी दिवस पर खामोशी क्यों?”—पूर्व विधायक ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और भाजपा सरकार को घेरा
रायपुर/भरतपुर-सोनहत। विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर छत्तीसगढ़ की सियासत गरमा गई है। भरतपुर-सोनहत विधानसभा क्षेत्र के पूर्व कांग्रेस विधायक गुलाब कमरों ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और भाजपा सरकार पर आदिवासी समाज की कथित उपेक्षा का गंभीर आरोप लगाते हुए सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए हैं।
कमरों ने कहा कि प्रदेश में बड़े-बड़े त्योहारों और सरकारी आयोजनों के दौरान मुख्यमंत्री के पोस्टर-होर्डिंग से शहरों और गांवों को पाट दिया जाता है। सरकारी प्रचार-प्रसार पर बड़े पैमाने पर राशि खर्च की जाती है, लेकिन विश्व आदिवासी दिवस जैसे आदिवासी समाज के गौरव और अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण अवसर पर सरकार की ओर से अपेक्षित उत्साह और व्यापक प्रचार दिखाई नहीं दिया।
“आदिवासी चेहरा आगे, नीतियां किसके लिए?”
पूर्व विधायक ने तंज कसते हुए कहा कि यदि प्रदेश में आदिवासी समाज को सम्मान देने की बात की जाती है, तो उसके सबसे महत्वपूर्ण दिवस पर सरकार की संवेदनशीलता भी दिखाई देनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार का आदिवासी प्रेम केवल राजनीतिक मंच और प्रचार तक सीमित दिखाई देता है।
कमरों ने कहा कि आदिवासी समाज केवल चुनावी राजनीति का चेहरा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की पहचान, संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों का वास्तविक संरक्षक है। इसलिए उसके अधिकारों और सम्मान के सवाल को केवल राजनीतिक नारों तक सीमित नहीं किया जा सकता।
जल-जंगल-जमीन पर भी सरकार को घेरा
गुलाब कमरों ने आदिवासी क्षेत्रों में जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए आरोप लगाया कि प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों पर बड़े उद्योगपतियों की बढ़ती दखल के बीच स्थानीय आदिवासी समुदाय के हितों की अनदेखी की जा रही है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जिस समाज के नाम पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता की तस्वीर बनाई जाती है, उसी समाज के अधिकारों, रोजगार, जमीन और संसाधनों की सुरक्षा को लेकर सरकार का वास्तविक रुख क्या है?
“वनवासी मुख्यमंत्री, सिर्फ चेहरा आदिवासी का” पोस्टर से बढ़ी सियासी गर्मी
इसी बीच सोशल मीडिया पर सामने आए एक पोस्टर ने राजनीतिक बहस को और हवा दे दी है। पोस्टर में “वनवासी मुख्यमंत्री: सिर्फ चेहरा आदिवासी का” जैसे नारे के जरिए सरकार की नीतियों और उद्योगपतियों के साथ कथित नजदीकी पर सवाल उठाए गए हैं।
पूर्व विधायक कमरों ने इसी राजनीतिक विमर्श को आगे बढ़ाते हुए आरोप लगाया कि आदिवासी चेहरा सत्ता में दिखाई जरूर देता है, लेकिन सत्ता की नीतियों का लाभ वास्तविक रूप से किसे मिल रहा है—यह बड़ा सवाल है।
भाजपा के जवाब का इंतजार
गुलाब कमरों के तीखे बयान के बाद विश्व आदिवासी दिवस का आयोजन राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है। कांग्रेस ने जहां इसे आदिवासी सम्मान और अधिकारों का सवाल बनाया है, वहीं भाजपा सरकार के सामने इन आरोपों का जवाब देने की चुनौती है।
अब सवाल सिर्फ पोस्टर और बधाई संदेश का नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के सम्मान, जल-जंगल-जमीन और विकास में उसकी वास्तविक भागीदारी का है। राजनीतिक बयानबाजी के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन आरोपों पर क्या जवाब देती है।





