नवाटोला बॉर्डर से मकरोहर-बैढ़न मार्ग बदहाल, उखड़ी सड़क और बाहर निकले पत्थर बन रहे हादसों का खतरा

ओड़गी। चांदनी-बिहारपुर क्षेत्र को मध्यप्रदेश के मकरोहर और बैढ़न से जोड़ने वाला नवाटोला बॉर्डर–मकरोहर-बैढ़न मार्ग इन दिनों बदहाली की ऐसी तस्वीर पेश कर रहा है, जिस पर शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजिमी है। पिछले वर्ष मरम्मत के बावजूद सड़क कुछ ही समय में फिर उखड़ गई। जगह-जगह गहरे गड्ढे, बिखरे पत्थर और क्षतिग्रस्त सड़क राहगीरों के लिए मुसीबत बन चुके हैं।
सबसे गंभीर स्थिति रात और बारिश के दौरान बनती है। गड्ढों में पानी भर जाने से उनकी गहराई का अंदाजा नहीं लग पाता, जबकि सड़क की सतह से निकले पत्थर दोपहिया वाहनों के लिए सीधे हादसे का खतरा बने हुए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही जिम्मेदार विभाग की नींद खुलेगी?
पिछले साल मरम्मत, फिर क्यों उखड़ गई सड़क?
स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक इस मार्ग की पिछले वर्ष मरम्मत कराई गई थी। लेकिन मरम्मत के कुछ समय बाद ही सड़क दोबारा टूटने लगी और अब कई हिस्सों में हालत बेहद खराब हो चुकी है। ग्रामीणों ने मरम्मत कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए जांच की मांग की है।
यदि सरकारी राशि खर्च कर सड़क की मरम्मत कराई गई थी तो इतनी कम अवधि में सड़क दोबारा जर्जर कैसे हो गई? निर्माण में किस गुणवत्ता की सामग्री इस्तेमाल हुई, कार्य की तकनीकी जांच किसने की और भुगतान से पहले गुणवत्ता का परीक्षण हुआ या नहीं, इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग को देना चाहिए।
बिहारपुर की लाइफलाइन, बदहाल सड़क ने बढ़ाई परेशानी
चांदनी-बिहारपुर क्षेत्र के लिए यह मार्ग महज सड़क नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ा महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है। बाजार, व्यापार, शिक्षा, रोजगार, सरकारी कामकाज और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बैढ़न की ओर निर्भर रहते हैं।
ऐसे में सड़क की बदहाली का सीधा असर हजारों ग्रामीणों के आवागमन पर पड़ रहा है। खराब सड़क के कारण वाहन चालकों को जहां आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, वहीं समय भी अधिक लग रहा है।
इलाज के लिए बैढ़न, लेकिन रास्ता खुद मरीजों के लिए खतरा
क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के कारण गंभीर मरीजों को बेहतर उपचार के लिए बैढ़न ले जाना कई बार आसान विकल्प माना जाता है। लेकिन जिस मार्ग से मरीजों और उनके परिजनों को गुजरना पड़ता है, वही मार्ग गड्ढों और पत्थरों से भरा पड़ा है।
आपात स्थिति में एंबुलेंस या निजी वाहन की रफ्तार सड़क की हालत के कारण प्रभावित होना गंभीर चिंता का विषय है। स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंचने का रास्ता ही असुरक्षित हो तो ग्रामीणों की परेशानी का अंदाजा लगाया जा सकता है।
110 किमी दूर जिला मुख्यालय, फिर भी सड़क पर ध्यान नहीं
ग्रामीणों के अनुसार बिहारपुर क्षेत्र से सूरजपुर जिला मुख्यालय लगभग 110 किलोमीटर दूर है। ऐसे में स्थानीय लोगों की निर्भरता आसपास के बड़े बाजार और चिकित्सा केंद्रों पर अधिक रहती है। इसके बावजूद क्षेत्र को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है।
छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश सीमा से जुड़े इस मार्ग की बदहाली केवल स्थानीय आवागमन का विषय नहीं, बल्कि अंतरराज्यीय संपर्क और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों की प्रशासनिक पहुंच से भी जुड़ा सवाल है।
मरम्मत पर खर्च के बाद भी सड़क बदहाल तो जवाबदेह कौन?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि पिछले वर्ष सड़क पर मरम्मत कार्य हुआ था तो कुछ ही समय में सड़क फिर गड्ढों में क्यों बदल गई?
क्या मरम्मत कार्य की गुणवत्ता की जांच हुई थी?
क्या तकनीकी अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया था?
कार्य पूरा होने के बाद गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसकी थी?
सरकारी राशि का कितना भुगतान हुआ?
और सड़क खराब होने के बाद संबंधित विभाग ने क्या कार्रवाई की?
इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होना जरूरी है। क्योंकि मामला केवल सड़क के टूटने का नहीं, बल्कि सरकारी धन के उपयोग और निर्माण कार्य की जवाबदेही का भी है।
बड़े हादसे से पहले जागे प्रशासन
ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि नवाटोला बॉर्डर से मकरोहर-बैढ़न मार्ग का तत्काल निरीक्षण कराया जाए। सड़क की तकनीकी जांच कराकर गुणवत्तापूर्ण स्थायी निर्माण कराया जाए। साथ ही जब तक स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक बड़े गड्ढों को भरने और सड़क से निकले पत्थरों को हटाने की तत्काल व्यवस्था की जाए।
ग्रामीणों की दो टूक मांग है कि खानापूर्ति की मरम्मत नहीं, बल्कि टिकाऊ सड़क चाहिए। अब देखना होगा कि हादसे का इंतजार करने के बजाय जिम्मेदार विभाग कब इस जर्जर मार्ग की सुध लेता है।





